Sunday, January 29, 2012

भोर की ओर!!!!

तमस घनघोर है,
निराशा का शोर है |
विप्लव चहुँ ओर है,
दिखती नही भोर है |

आशा का दामन छूटा,
निराशा ने सब कुछ लूटा,
उत्तर क्या, दक्षिण क्या?
पूरब क्या, पश्चिम क्या?
चतुर्दिक का ज्ञान छूटा |

प्रेम क्या, पाश क्या?
नींद क्या, श्वांस क्या?
किसी चाहत की आस क्या?
कुछ पाऊंगा, काश क्या?

उमंगों की मौत हुई,
निंदिया भी सौत हुई.

बस..बस..बस..बस,

निराशा का सूरज ढले,
आशा का चांद उगे,
कुछ उम्मीदों के आकाश तले |

नाउम्मीदी कुछ पल की है,
ज़रूरत आत्म बल की है,
ये दिन भी कट जायेंगे,
निराशा के बादल छट जायेंगे |

चलो,चलें भोर की ओर,
उमंगों के शोर की ओर,
चलो,चलें भोर की ओर,
भोर की ओर......|

:-
अभिषेक कुमार पटेल |
२६ जुलाई ,२००४

छिपकली बनाम नेता !!!

डायनोसोर की जाती की, प्राणी जो है छिपकली,
नेताओं के गुण दिखलाती, प्राणी जो है छिपकली |
रंग बदलती नेताओं सी, सुनने में लगती 'कली',
जैसे नेता हैं वैसी ही, लगती ये ऊपर से भली |

जनता जब पड़ती है नेता और मंत्री के फेरे में,
लुट जाती है वो बिल्कुल जब फंसती 'तेरे-मेरे' में |
आश्वासन-वादों के लौलिपौप दिखाते हैं नेता,
जनता कैसे समझे नेता हैं बस वोटों के क्रेता |

वैसे ही छिपकली है भाई जो कीड़ों को मारे,
कीड़े तो बस शमां के कारण, मर जाते सारे-के-सारे |

पर नेता छिपकली से अलग है, क्यूंकि;

छिपकली रहे घर की दीवार पे और नेता का है जग सारा,
छिपकली खा सके बस कीड़े-ही-कीड़े, नेता तो खा सकते हैं चारा ||

अभिषेक कुमार पटेल |
२० सितम्बर, १९९९

प्रकृति की शक्ति !!!

आशाओं के दीपों की बाती कहती मुझसे झिलमिल,
लिप्साओं की लाल लटाएं होंगी तृप्त, बढ़ा ही चल |
ये इच्छाएँ त्याग चाहतीं और चाहतीं रक्त औ स्वेद ,
बली भोगते यश-कीर्ति, भीरुओं हेतु अवसाद औ खेद |

स्वप्न-मरीचिका के भ्रम में, उलझें कायर औ बलहीन,
'पुरुष' उसी मरीचिका से रचे सफलता हो तल्लीन ||

मानव 'मानव-शक्ति' से है अनजाना, ये ना जाना,
इसको दैत्य-गन्धर्व क्या, सुरेश्वरों ने भी माना |
इसने नए इतिहास रचे, गढ़े गूढ़ इतिहास औ ग्रन्थ |
दी मानव को नयी सभ्यता, नवसंस्कृति-धर्म-नवपंथ ||

वही शक्ति श्री-शुभ्र-धवल पंखों को नभ में खोल विचरती |
देख मनुज की दुर्दशा, कम्पित हो, स्पंदन-स्वरुप यह कहती ,
हे मानव! पुरुषार्थ छोड़, लालच दुराचरण का मार्ग जो तुने गहा है,
झाँक तेरे इतिहास में, उसने इसे नरक का द्वार कहा है ||

समय सदा निर्बाध-गति से चलकर प्रलय फिर लाएगी,
यह भविष्यवाणी तेरे कारण ही सत्य कहलाएगी |
तजा यदि अब भी तुने इन दुष्ट विकारों को ना,
सर्वप्रथम तू ही इसका ग्रास बनेगा,देखना ||

मानव-शक्ति भी प्रकृति के नियमों से ही बंधी है,
ये तो प्रकृति की अनुगामिनी है, उसकी सहचरी है |
प्रकृति-माता से पा शक्ति भोग सका नर जग को,
अन्यथा काल ने ग्रास बनाया कंस को, रावण को ||

प्रकृति ही है ॐ, ओंकार भी है, वही शिव-शक्ति,
शक्तिमान-आर्यमान बने वह, जो करे इनकी भक्ति |
अंततः प्रकृति की शक्ति को पहचाना है जिसने,
मानव क्या, इश्वर को भी है दास बनाया उसने ||

अभिषेक कुमार पटेल |
२२ फ़रवरी,२००३

"कल्पना"!!!

आशा या निराशा-महज़ शब्द भर रह जाते हैं,
जब ज़हन में जज़्ब हो कल्पना |
इसकी सीमायें अपार,असीमित विस्तार,
प्रकाश ही प्रकाश, सब कुछ संभव |
सिखाये ये सबको आशावादिता का पाठ |
कुछ ऐसा ही है उस कल्पना से परे इस कल्पना का जीवन |

खेली है वो भी निराशा की गोद में,
सुनी है उसने भी असफलताओं की लोरी |
पर वो कल्पना ही क्या,टूटे जिस पतंग की डोरी?
अपनी अदम्य जीजिविषा से पायी सफलता की उड़ानें जिसने,
कटु बाणों की वर्षा झेली, बचपन को रख सिरहाने उसने |

बचपन भुलाये नहीं भूलता...
वो सोचती है.."क्यों नहीं भूलता?"
"वो बचपन जिसमें उसे बड़ों के सारे कर्त्तव्य पड़े निभाने |"
...बड़ी हुई..|
यौवन लगी कई स्वप्न दिखाने..
और समाज लगा खुशियों के लॉलीपॉप से ललचाने |
"इस्पे तेरा हक नहीं है, लड़ के ले सकती है तो ले ले"
वो लड़ी..लड़ रही है...
कभी गिरती है...कभी संभलती है |

पर मानव-जीवन सिर्फ नाम से ही हकीक़त नहीं बनता,
कल्पना "जीवन" है "कल्पना" नहीं;
आखिर इसकी भी सीमाएं हैं,
पूरी न होने पे थक जाएँ-ऐसी इच्छाएं हैं |

इस जीवन-युद्ध में एक कृष्ण की तलाश उसे भी है,
सपनों के बीज को किसी सहारे की प्यास उसे भी है |

मिलेगा ज़रूर इस किश्ती को किनारा,
क्योंकि ऊपरवाले के घर देर है अंधेर नहीं है ||

-- अभिषेक कुमार पटेल,
बंगलोर |

मित्र!!! - स्कूल/कॉलेज के दिनों की कुछ खट्टी-मीठी यादें!

ना जाने क्यों, फिर-फिर विश्वास जमता जाता है|
लाख रोकूँ दिल को;इसपे मेरा बस ना अब चलता है|
कहता है-विश्वास कर! ये सच्चे हैं,धोखा ना तू खाएगा |
क्या करूँ? ऐसों ने ही तो ज़ख्म दिए,जो फिर मुझे सताएगा|
मेरी निश्छल,निपट,नेह-नगरी को फिर लूट कोई जाएगा|
और तू मुझे फिर से अकेला,आहत-अवाक खड़ा पाएगा ||

याद आती हैं-वो हिरनी-सी दरी-सहमी आँखें |
जिनमें अपनी छवि पाने को, बेबाक बहादुर खड़ा था मैं,
खड़ा था-आस में की पाऊंगा नेह-स्नेह की थोड़ी भिक्षा मैं भी |
किन्तु हाय! मित्रता मुंह बाए कड़ी थी, धुन्धती बलिदान मेरी आँखों में;
आँखें तो स्नेह से भरी थीं , बरस पड़ीं, निर्झर हुआ प्रेम-बलिदान |
खड़ा घात लगाए "मित्र" झपटा; मैं रहा हैरान-परेशान |

क्या जनता था, 'मित्र' मित्रता का मोल ऐसे लेगा?
इन प्राणों की बाटी क्या; तेल भी सारा वो हर लेगा |
फिर भी खुश; मित्र के काम आया, मित्रता धन्य हुई |
क्या जानता था,गलती मुझसे एक और अन्य हुई |

खैर! वक़्त बदला, जगह बदली-मैं ना बदला |
दोस्ती की लुभावनी खंदक देखके भी मैं ना संभाला |

गिर रहा हूँ-इस खंदक में-'अंतहीन खंदक में'-सर के बल |
दिल तो करे अट्टहास; मन कहे-"अब भी संभल |"
फिर खाएगा धोखा; कुछ कस्में खाएगा- नई-नवेली |
पर कुछ दिनों में ही कहेगा- "ज़िन्दगी नहीं कटती अकेली |"

फिर से करेगा विश्वास ; फिर धोखा खाएगा ;
फिर से कुछ कस्में ; फिर से विश्वास और फिर......|


अभिषेक कुमार पटेल
जून, २००४

Thursday, January 5, 2012

My Childhood Memory!

I was a teen, around 8-10 years of age & was enjoying the serene life at my village.
It was a hot summer afternoon & we used to run to our mango orchards as soon as a small hint of wind-storm (local term is loo) was there.
I used to visit my orchards with all my village neighbors & cousins, looking for the fallen, ripe or raw mangoes.
It was kind of competition to get maximum & the sweetest/ripest mangoes amongst us.
I clearly remember that day when I just got 2-3 mangoes out of which 1 was totally ripe & promised to be very sweet from the color & texture.
Just when I was about to enter the house, I heard a low but clear voice, asking "who is this?"

It was my grandfather, around 88 years of age, with quite low or almost no sight due to age. He was kind of a watchdog (Please forgive me for the word used, but that's the reality in our Indian Joint families where Grandparents are reduced to such stature) sitting at our gate right from the morning till late evening, asking each & every visitor who he/she was, parentage & caste.
I could never connect well with my grandfather then but really miss him now once I've understood & realized the importance of relationships.

As soon as that voice hit my ears, I got quite afraid just with the thought of losing my prized booty. I felt as if my Grand-pa was a spoilsport who would again start with his series of questions.
"What have you brought, son?" Came the next question & my heart started sinking. I was just a kid & could not even think of sharing my precious possession.
"Smells as if you've got some sweet mangoes" My grandfather said & I was surprised to realise that all his power of the vision had been shifted & added to his other senses of smell & hearing.
"Beta, I can't chew much harder things, So If You've got some ripe mangoes, give me one", Came the next bouncer from my Grandpa.
I was really anticipating such statement but didn't expect such straight demand.

I still can't understand the reason why I simply kept that ripe mango on his hands & he said "Jeete raho baabu".
I could easily have lied to him & could get away with that mango but it was an unexplainable/inexplicable experience watching him savouring the ripe mango with his few remaining teeth.
I really feel so proud & happy for that small & unintentional decision of mine that still fills my heart with nostalgic warmth.
This nostalgia & warmth of relationships can easily be comprehended by anyone who has had a Dejavu.

I really miss my Grandfather now, more so because I never saw or remembered any other grandparent of mine.

Wednesday, December 28, 2011

Literature & Nostalgia

Many a times have I thought that Nostalgia has always been a single source for my literary inspirations.

Present is stressful,Future Uncertain & painful. It's only the good & sweet memories of the past that works as inspiration & keeps us going.

Anyone would love a mirror that shows your hair black rather than grey.

Present events can never have so much effect on your conscience & your thinking nerves as much as the Nostalgic phases of your life. Maybe because,the past events have given you so much time to ponder upon that they form a kind of heaped-up lava that finally erupt in the literary volcanoes of anecdotes,stories or beautiful poems.

Another reason that comes to me is the small child in all of us who never wishes to grow up,deep inside us, & wants to cling on to those nostalgic moments that have been preserved layer-by-layer,maybe like an onion.

Nostalgia also serves as a respite from the comparatively stressful & fast present that hardly gives you time to sit back,relaxe & decide if you're living your life to the fullest.

Most of the great literary pieces have always been Reflections of the writer's personal or social past,expressed through the fibre of the then characters,places & events.That's why we were suggested to have a background reading of any writer before reading & analysing their poems,plays & novels etc.

However,Nostalgic moments are painful as well but only when there is a repenting feeling of having/not having done something in your past.I always repent not having proposed that beautiful girl in Std.9th whom my friend proposed,she accepted his proposal & later that friend of mine ditched her.

Literature,nonetheless,will always have many more muses & inspirations for its patrons & Nostalgia in itself will also be one of those Lighthouses that will guide the writers' sailing ship to enlighten him/her to get across the Writers' block.

Abhishek Kumar Patel.
28.12.2011